Ghatothkach ki Kahani in Hindi

द्वापर युग के अंत में हुए धर्म युद्ध की गाथा हमारे ग्रन्थ, महाभारत के पन्नो में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। जहाँ हम धर्म के स्थापक, श्री कृष्ण और कर्म योग के महत्व को दिखाने वाले अर्जुन की बात पड़ते है, धर्म और अधर्म के बीच हुए इस युद्ध में न जाने कितने ही महारथियों और रथियो ने अपने पराक्रम का प्रदर्शन किया, 18 दिन चले इस महायुद्ध के 14वे दिन एक ऐसे महबली ने हिस्सा लिया  जिसके बलिदान के बिना भगवान् कृष्ण भगवान कृष्णा का वो वचन पूरा नहीं होता जो उन्होंने अपनी बुआ कुंती को दिया था। एक ऐसा पुत्र जो जन्म लेते ही अपने पिता से दूर हो गया, परन्तु फिर भी उनकी एक आज्ञा पर उसने अविश्वसनीय पराकर्म दिखाकर कौरवो को रणभूमि से भागने पर विवश कर दिया था । महावारियर की आज की इस प्रस्तुति में हम बात करने जारहे है “महाबली भीम अउ हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कच की। 

महाभारत में उल्लेखित कथा के अनुसार ,लाक्षागृह के दहन के बाद, पांडव अपनी माँ कुंती के संग सुरंग के रस्ते सुरक्षित बाहर निकले और किसी अज्ञात स्थान की खोज करते हुए वह सभी काम्यक नामक वन में जा पहुंचे जिसका राजा राक्षस हिडिम्ब था। कई कोस चलने के कारण सभी थक चुके थे, इसी कारण एक वट वृक्ष के निचे आराम करने लगे और भीमसेन को देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी गई, कुछ ही शणो में सभी थकान के कारण निद्रा में खो गए। राक्षस हिडिम्ब को उन सभी की गंध आने लगी और उसने अपनी बहन हिडिमाबा को बुलाकर आदेश दिया…

हिडिम्बा, मेरे वन में ज़रूर कोई मानव आया है। तुम इसी क्षण उसे मेरे पास लेकर आओ। मैं उसे अपना आहार बनाने के लिए व्याकुल हो रहा हूँ (Grunts).

अपने क्रूर भाई के आदेश का पालन करने के लिए हिडिम्बा पांडवो को ढूंढ़ने लगी और उनके पास जा पहुंची। भीम की कद काठी और वज्र के समान मज़बूत शरीर देख वह उस पर पहली नज़र में ही मोहित होगाई  और एक सुंदर अप्सरा का रूप लेकर भीम के निकट जा पहुंची और बोली।

हे आर्यमान आप कौन है और इस वन में क्या कर रहे है।

मेरा परिचय छोड़िये, परन्तु आप इस भयानक वन में  क्या कर रही है ?

हे नरश्रेष्ठ! मैं हिडिम्बा नाम की राक्षसी हूँ। मेरे भाई ने मुझे आप लोगों को पकड़कर लाने के लिये भेजा है किन्तु मेरा हृदय आप पर आसक्त हो गया है तथा मैं आपको अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती हूँ। मेरा भाई हिडिम्ब बहुत दुष्ट है, पर मैं आपको उसके चंगुल से बचा कर सुरक्षित स्थान तक पहुँचा सकती हूँ। 

वही भूक में व्याकुल हिडिम अपनी बहन की प्रतीक्षा करते हुए गुस्से में आग बबूला हो गया और स्वयं उसे ढूंढ़ने निकल पड़ा, वन में अपनी बहन को भीम को रिझाते देख उसका गुस्सा फुट पड़ा और उसने भीम को युद्ध के लिए ललकारा, भीषण युद्ध के बाद भीम ने हिडिम की गर्दन तोड़ कर उसे मौत के घाट उतर दिया।  युद्ध खत्म होने पर जब सभी भाइयो और कुंती ने वहां की स्तिति देखि तो वह सभी अचंबित रह गए।  कुंती ने हिडम्बा से उसके वहां होने का प्रयोजन पहुंचा …



हे माता, मैं आपके पुत्र के इस बल और शौर्य पर मोहित हूँ और इन्हे अपना पति स्वीकार चुकी हूँ, कृपया आप भी मुझे  स्वीकार कर लीजिये वार्ना मैं अभी इसी शण अपने प्राण त्याग दूगी।


अपने भाई के प्रति इतना प्रेम देखकर युधिष्ठिर, भीम को हिडिम्बा को सौंप देते है परन्तु एक शर्त के साथ।


हिडिम्बा, आज से मैं अपनेअनुज को एक वर्ष के लिए तुम्हे सोंपता हूँ, परन्तु भीम सिर्फ दिन में ही तुम्हारे साथ रहेगा और रात्रि में वह हमारे पास लोट आएगा।



हिडिम्बा ने युधिष्टर के इस आदेश को स्वीकार कर लिया, जिसके पश्चात भीम ने पुरे एक बार्स तक काम्यक वन पर राज किया और इसी दौरान उसे और हिडिम्बा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका सर मटके के समान गोल और बिना बालो के था, जिस कारण उसका नाम घटोत्कच रखा गया। इसके पश्चात घटोत्कच को हिडिम्बा के संगरक्षण में छोड़ भीम अपने भाइयो के साथ आगे निकल पड़े।


घटोत्कच का लालनपालन उसकी माँ हिडिम्बा ने किया और उसे सभी असुर मायावी शक्तियों और अस्त्रों का ज्ञान दिया।  घटोत्कच में भीम और हिडिम्बा दोनों के ही अंश थे जिस करण उसमे अलौकिक बल और मायावी शक्तिया थी, जैसे की वह अपने कद को कितना ही बड़ा या छोटा कर सकता था, वह कही से भी गायब होकर कही भी प्रकट हो सकता था, अपनी दिव्य शक्तियों से अनगिनत बाणो की वर्षा कर सकता था और किसी भी अस्त्र की मायावी नक़ल बना सकता था। इतना ही नहीं घटोत्कच को अर्जुन से अग्नि अस्त्र और भीम से वायु अस्त्र भी प्राप्त था।


घटोत्कच अपने पिता की कहानिया सुनकर बड़ा हुआ था, जिस कारण उसका अपने पिता और बाकी सभी पांडवो के लिए आदर और सामान था।  महाभारत की एक कथा के अनुसार, अपनी माँ हिडिम्बा की पूजा पूरी कराने के लिए घटोत्कच वन में एक उपयुक्त मानव को ढूंढ रहा था जिसकी वह बलि दे सके, उसी वन से भीम भी गुज़र रहे थे. इस बात से अनजान की भीम ही उसके पिता है, वह उन्हें उठाकर अपनी माँ हिडिम्बा के पास ले आया और अपने पति को इतने वर्ष बाद देखकर वह ख़ुशी में बोली ….



हे आर्य पुत्र, कितने ही वर्ष बीत गए पर आप नहीं आए और मैंने भी अपना वचन पूरा किया।  मैंने आपके पुत्र घटोत्कच को वह सभी गुण दिए है जो इसे आपके लायक बनाता है।


हिडिम्बा, प्रिय … इतने वर्षो बाद तुम्हे देख कर मैं भी अत्यंत खुश हूँ और मेरा पुत्र घटोत्कच ….तुम्हारा शरीर एक दम वज्र के समान है।


मैं जो भी हूँ अपनी माता की दी हुई शिक्षा की वजह से ही हूँ। पिता जी मुझे भी अपने साथ ले चलिए मैं आपसे गदा युद्ध और काका अर्जुन से धनुर्विद्या सीखना चाहता हूँ।


पुत्र मैं ज़रूर तुम्हे अपने साथ ले चलता परन्तु अभी समय नहीं आया है।भीम घटोत्कच और हिडिम्बा को अपने 14 वर्ष के वनवास के बारे में बताता है और ये भी की इसक पश्चात एक बहुत ही भयंकर धर्म युद्ध होने की आशंका है , जिसे जान कर घटोत्कच अपने पिता को ये आश्वासन देता है की…


पिता जी आप बिलकुल भी मत घबराइए में सभी असुर कलाओ में निपुण हूँ, मेरी मायावी शक्तिया किसी भी सेना को पराजित कर सकती है। आपको जब भी मेरी आवश्यकता हो, बस मुझे तीन बार पुकार लीजिएगा और मैं अपनी पूरी राक्षस सेना लेकर आपके चरणों में उपस्तिथ हो जाऊंगा।


अपने पुत्र की बाते सुनकर, भीम वापस अपनी कुटिया में लोट गए और संघर्षो से गुज़रते हुए उन्होंने अपना वनवास पूरा कर लिया, इसके पश्चात हुआ विश्व का सबसे बड़ा धर्म युद्ध, महाभारत का युद्ध। महाभारत के अनुसार भगवान् कृष्ण को ज्ञात था की कर्ण के पास  इंद्रदेव से एक ऐसा शक्ति अस्त्र प्राप्त है जिसे वह सिर्फ अर्जुन पर इस्तेमाल करना चाहता था और अर्जुन के पास उसकी कोई भी काट नहीं थी, जिस कारण श्री कृष्ण ने भीम से कहा


भीम तुम शीग्र ही अपने पुत्र घटोत्कच को स्मरण करो और उसे इस युद्ध में अपने कुटुंब के साथ लड़ने का आदेश दो।



भीम ने श्री कृष्ण के आदेश अनुसार तीन बार अपने पुत्र को पुकारा और वह अगले ही शण वहाँ उपस्थित हो गया और सभी पांडवो को निर्भय होने का आश्वास दिया। महाभारत के आठवे और नौवे दिन घटोत्कच ने अर्जुन के नाग पुत्र इरावन के साथ कौरव सेना में हाहाकार मचा दी। पांडवो की राक्षस सेना को देख दुर्योधन ने अपने राक्षस मित्र अलमबुष को बुलाया …

मित्र अलमबुष, घटोत्कच और इरावन ने अपनी मायावी शक्तियों से मेरी नाक में दम कर रखा है, इक तुम ही हो जो उससे लड़ सकते हो।


तनिक भी चिंता मत  करो मित्र, मैं शनभर में ही उनका नाश कर दूंगा।


इसके पश्चात, अलमबुष और इरावन में भयंकर युद्ध हुआ और इरावन वीरगति को प्राप्त हुआ, जिसे देख घटोत्कच अत्यंत क्रोधित  हो उठा, जिसके पश्चात  घटोत्कच और अलमबुष में भयंकर मायावी युद्ध छिड़ गया।  दोनों तरफ से अग्नि के बाणो की वर्षा होने लगी और अंत में घटोत्क्च ने अलमबुष के सर को उखड कर दुर्योधन के पैरो में फेंक दिया। दसवे और 11वे दिन घटोत्कच का सामना करने भीष्म रणभूमि में उतरे पर उनके सभी बाण  विफल हो गए और उन्होंने अपने रथ का मुख अर्जुन की और मोड़ दिया।  12वे और 13वे दिन अपने भाई अभिमन्यु की मृत्यु के बाद घटोत्कच ने कुरक्षेत्र में तहलका मचा दिया और अपने कद को विशाल करते हुए कुरु सेना को कुचलने लगा, घटोत्कच ने अपनी माया शक्ति से अग्नि बाणो की वर्षा की  जिससे कुरु सेना डरके मारे रणभूमि से भागने लगी, और दुर्योधन भी घायल होगया। गुस्से में तिलमिलाए  दुर्योधन ने अपने परम मित्र कर्ण से कहा …



मित्र कर्ण, घटोत्कच ने अपनी मायावी शक्तियों से हमारी सेना को तितरबितर कर दिया है। मित्र,  तुम शीग्र ही वासावी शक्ति अस्त्र का उपयोग करो और इस मुसीबत से छुटकारा दिलाओ।

मित्र ये अस्त्र मैंने अर्जुन के वध के लिए संभाल रखा है, इसके एक बार इस्तेमाल के बाद इसे पुनः इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। मैं घटोत्कच को यूँ भी रणभूमि से खदेड़ सकता हूँ।


परन्तु दुर्योधन ने कर्ण की एक ना सुनी और विवशतापूण कर्ण ने  शक्ति अस्तर का आवाहन किया, और भाले के रूप में दिव्ये अस्त्र को विशालकाय घटोत्कच की और फेंका दिया,  इस अस्त्र का तोड़ किसी के पास नहीं था, जैसे ही शक्ति अस्त्र घटोत्कच के सीने में लगा, घटोत्कच ने अपने शरीर को इतना विशालकाय बना लिए की सूर्य भी ढक गया, तभी भीम ने घटोत्कच को कुरु सेना पर गिरने आदेश दिया। अपने अवश्यनीय विशाल शरीर को लेकर घटोत्कच कुरु सेना पर गिर पड़े जिससे एक तिहाई कुरु सेना का नाश हो गया और अपने इसी महापराक्रम के साथ ही घटोत्कच वीरगति को प्राप्त हुए।




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